Understanding Significant Figures and Measurement Errors

1) सार्थक अंक क्या होते हैं? सार्थक अंकों के प्रमुख नियमों को लिखिए।

= सार्थक अंक वे अंक होते हैं जो किसी संख्या में महत्वपूर्ण होते हैं और जो उस संख्या के मान को दर्शाते हैं। किसी संख्या के सार्थक अंकों की गणना करते समय, हम उन अंकों को ध्यान में रखते हैं जो उस संख्या की वास्तविक मान को प्रभावित करते हैं।

सार्थक अंकों के प्रमुख नियम:

  • 0 से 9 के अंकों को शामिल करें: 0 से 9 तक के सभी अंकों को सार्थक अंक माना जाता है। उदाहरण के लिए, 123 में तीन सार्थक अंक हैं।
  • शून्य के स्थान: यदि एक संख्या में शून्य (0) पहले आता है, तो वह सार्थक अंक नहीं होता है। जैसे 0.0045 में केवल 4 और 5 सार्थक अंक हैं।
  • शून्य के बाद: यदि शून्य किसी संख्या के अंत में आता है और वह दशमलव के दाईं ओर है, तो वह सार्थक अंक होता है। जैसे 1500 में शून्य सार्थक नहीं है, लेकिन 1500.0 में शून्य सार्थक है।
  • दशमलव के बाद के अंक: दशमलव के बाद के सभी अंक सार्थक होते हैं। उदाहरण के लिए, 0.0045 में 4, 5 सार्थक अंक हैं।
  • गणना में सार्थक अंक: जब आप कोई गणना करते हैं, तो परिणाम में सार्थक अंकों की संख्या सबसे कम सार्थक अंकों वाले माप से निर्धारित होती है। जैसे 2.5 (2 सार्थक अंक) और 3.42 (3 सार्थक अंक) का गुणनफल 8.55 होगा, लेकिन इसे 2 सार्थक अंकों के रूप में लिखा जाएगा, यानी 8.6।

इन नियमों का पालन करके आप किसी भी संख्या के सार्थक अंकों की सही संख्या का निर्धारण कर सकते हैं।


2) किसी भी भौतिक राशि की परम त्रुटि, आपेक्षिक त्रुटि व प्रतिशत त्रुटि को परिभाषित कीजिए।

= भौतिक राशि की त्रुटियाँ तीन प्रकार की होती हैं: परम त्रुटि, आपेक्षिक त्रुटि और प्रतिशत त्रुटि। आइए इन तीनों को विस्तार से समझते हैं:

  • परम त्रुटि (Absolute Error): परम त्रुटि किसी माप की वास्तविक मान (True Value) और मापे गए मान (Measured Value) के बीच का अंतर होती है। इसे निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त किया जा सकता है:
    परम त्रुटि = |वास्तविक मान – मापे गए मान|
    यह त्रुटि माप के एकक में होती है और यह बताती है कि माप में कितना वास्तविकता से भिन्नता है।
  • आपेक्षिक त्रुटि (Relative Error): आपेक्षिक त्रुटि परम त्रुटि का एक अनुपात है, जो यह दर्शाती है कि त्रुटि का माप के वास्तविक मान के सापेक्ष कितना महत्व है। इसे निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त किया जाता है:
    आपेक्षिक त्रुटि = (परम त्रुटि / वास्तविक मान)
    इसे अक्सर प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि त्रुटि का माप कुल माप के कितने प्रतिशत है।
  • प्रतिशत त्रुटि (Percentage Error): प्रतिशत त्रुटि आपेक्षिक त्रुटि का प्रतिशत रूप है। इसे निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त किया जाता है:
    प्रतिशत त्रुटि = (आपेक्षिक त्रुटि * 100)
    यह त्रुटि को प्रतिशत के रूप में व्यक्त करती है, जिससे माप की सटीकता का एक स्पष्ट चित्रण मिलता है।

इन त्रुटियों का उपयोग भौतिक मापों की सटीकता और विश्वसनीयता को समझने में किया जाता है।


3) यादृच्छिक त्रुटि किसे कहते हैं?

= यादृच्छिक त्रुटि (Random Error) उस त्रुटि को कहते हैं जो किसी माप या परीक्षण में अनियमितता के कारण होती है। यह त्रुटि मापने की प्रक्रिया में कई कारणों से उत्पन्न हो सकती है, जैसे कि उपकरण की सटीकता, पर्यावरणीय प्रभाव, या प्रयोगकर्ता की तकनीक। यादृच्छिक त्रुटियों का परिणाम हमेशा भिन्न होता है और इन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होता है।

यादृच्छिक त्रुटियों को सामान्यतः सांख्यिकीय तरीकों से कम किया जा सकता है, जैसे कि कई माप लेकर औसत निकालना। इन त्रुटियों के विपरीत, प्रणालीगत त्रुटियाँ होती हैं जो एक निश्चित दिशा में होती हैं और इन्हें अधिक आसानी से पहचाना और ठीक किया जा सकता है।

इस प्रकार, यादृच्छिक त्रुटियाँ माप के परिणामों में अनियमितता लाती हैं और इन्हें सामान्यतः सुधारने के लिए अधिक मापों का उपयोग किया जाता है।


4) त्रुटि क्या है? क्रमबद्ध त्रुटि के क्या-क्या कारण हैं?

= त्रुटि (Error) एक ऐसी स्थिति है जब माप, गणना या किसी प्रक्रिया का परिणाम अपेक्षित या सही परिणाम से भिन्न होता है। त्रुटियाँ विभिन्न प्रकार की हो सकती हैं, जैसे यादृच्छिक त्रुटियाँ और क्रमबद्ध त्रुटियाँ।

क्रमबद्ध त्रुटि (Systematic Error) वह त्रुटियाँ होती हैं जो एक निश्चित दिशा में होती हैं। ये त्रुटियाँ लगातार एक ही प्रकार की होती हैं और इन्हें समय के साथ पहचाना और सुधारना संभव होता है। क्रमबद्ध त्रुटियों के कई कारण हो सकते हैं, जैसे:

  • उपकरण की गलतियाँ: यदि मापन उपकरण सही तरीके से कैलिब्रेट नहीं किया गया है, तो यह लगातार गलत माप दे सकता है। उदाहरण के लिए, एक तराजू जो हमेशा 0.5 किलोग्राम अधिक दिखाता है।
  • प्रयोगकर्ता की तकनीक: प्रयोगकर्ता की मापने की विधि में त्रुटियाँ भी क्रमबद्ध त्रुटियों का कारण बन सकती हैं। जैसे, यदि प्रयोगकर्ता हमेशा एक विशेष तरीके से मापता है जो गलत है।
  • पर्यावरणीय कारक: तापमान, दबाव, या अन्य पर्यावरणीय स्थितियों में परिवर्तन भी माप के परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, तापमान में वृद्धि से कुछ सामग्री का विस्तार हो सकता है, जिससे माप में त्रुटि हो सकती है।
  • सिस्टम में स्थायी प्रभाव: यदि कोई प्रक्रिया या प्रणाली स्थायी रूप से किसी विशेष तरीके से कार्य कर रही है, तो यह क्रमबद्ध त्रुटि का कारण बन सकती है। जैसे, यदि कोई प्रयोग हमेशा एक विशेष स्थिति में किया जाता है, तो परिणाम हमेशा उसी दिशा में भिन्न हो सकते हैं।

इस प्रकार, क्रमबद्ध त्रुटियाँ एक निश्चित दिशा में होती हैं और इन्हें पहचानना और सुधारना संभव है, जबकि यादृच्छिक त्रुटियाँ अनियमित होती हैं।


5) प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मापन से आप क्या समझते हैं?

= प्रत्यक्ष मापन और अप्रत्यक्ष मापन दो प्रकार के मापन हैं, जिनका उपयोग विभिन्न विज्ञानों और गणित में किया जाता है।

प्रत्यक्ष मापन वह होता है जिसमें मापने वाली वस्तु की मात्रा को सीधे मापा जाता है। उदाहरण के लिए, जब आप एक रूलर का उपयोग करके किसी वस्तु की लंबाई मापते हैं, तो यह प्रत्यक्ष मापन है। इसमें मापने के लिए किसी अन्य माप या गणना की आवश्यकता नहीं होती है।

अप्रत्यक्ष मापन, दूसरी ओर, वह प्रक्रिया है जिसमें किसी वस्तु की मात्रा को सीधे नहीं मापा जाता, बल्कि अन्य मापों के माध्यम से उसकी गणना की जाती है। उदाहरण के लिए, यदि आप एक त्रिकोण के क्षेत्रफल को मापना चाहते हैं, तो आपको उसकी आधार और ऊँचाई को मापना होगा और फिर क्षेत्रफल की गणना करने के लिए एक सूत्र का उपयोग करना होगा। इस प्रक्रिया में आप सीधे क्षेत्रफल नहीं मापते हैं, बल्कि अन्य मापों से उसकी गणना करते हैं।

इस तरह, प्रत्यक्ष मापन में सीधे मापने की प्रक्रिया होती है, जबकि अप्रत्यक्ष मापन में गणना और सूत्रों का उपयोग किया जाता है।


6) मापन उपकरण किसे कहते हैं? किसी भी मापन उपकरण का अल्पतमांक क्या होता है?

= मापन उपकरण उन उपकरणों को कहा जाता है जिनका उपयोग किसी मात्रा, जैसे लंबाई, चौड़ाई, वजन, तापमान, आदि को मापने के लिए किया जाता है। ये उपकरण हमें भौतिक मात्राओं को सटीकता से मापने में मदद करते हैं, ताकि हम वैज्ञानिक और तकनीकी कार्यों को सही तरीके से कर सकें।

अल्पतमांक (Least Count) किसी मापन उपकरण की सबसे छोटी मापने की क्षमता को दर्शाता है। यह वह न्यूनतम मान है जिसे उपकरण बिना किसी त्रुटि के माप सकता है। उदाहरण के लिए, यदि एक पैमाना 1 सेंटीमीटर के विभाजन में मापा जाता है, तो उसका अल्पतमांक 1 सेंटीमीटर होगा।

अल्पतमांक का महत्व यह है कि यह हमें यह समझने में मदद करता है कि उपकरण की सटीकता कितनी है और हमें मापने के लिए कितनी सावधानी बरतनी चाहिए।

उदाहरण के लिए, यदि आप एक वोल्टमीटर का उपयोग कर रहे हैं और उसका अल्पतमांक 0.01 वोल्ट है, तो आप केवल 0.01 वोल्ट की सटीकता के साथ माप कर सकते हैं।

इस प्रकार, मापन उपकरणों का सही उपयोग और उनके अल्पतमांक की जानकारी हमारे मापन को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाती है।


7) विमीय समांगता के सिद्धान्त का उपयोग लिखिए।

= विमीय समांगता के सिद्धान्त (Theory of Dimensional Homogeneity) का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है, मुख्यतः भौतिकी और अभियांत्रिकी में। इस सिद्धान्त के अनुसार, किसी समीकरण में सभी पदों की विमीय समांगता होनी चाहिए, अर्थात् सभी पदों के विमीय गुणांक समान होने चाहिए।

इस सिद्धान्त का उपयोग निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है:

  • समीकरणों की जाँच: किसी भौतिक समीकरण की वैधता की जाँच करने के लिए, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सभी पदों के विमीय गुणांक समान हैं। यदि नहीं, तो समीकरण गलत है।
  • विमीय विश्लेषण: यह सिद्धान्त हमें विभिन्न भौतिक मात्राओं के बीच संबंध स्थापित करने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, हम गति, समय, और दूरी के बीच के संबंध को समझ सकते हैं।
  • मापन की एकरूपता: जब हम किसी भौतिक परिमाण को मापते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी माप एक ही विमा में हों। यह सिद्धान्त हमें यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि माप सही और सटीक हैं।
  • समीकरणों का निर्माण: जब हम नए समीकरणों का निर्माण करते हैं, तो विमीय समांगता का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि सभी पदों की विमा समान हो।

इस प्रकार, विमीय समांगता का सिद्धान्त भौतिकी और अभियांत्रिकी में समीकरणों की वैधता, मापन की एकरूपता और नए समीकरणों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


8) विमीय समीकरण के उपयोग व सीमाएं लिखिए।

= विमीय समीकरण (Dimensional Equations) का उपयोग भौतिकी, गणित और इंजीनियरिंग में विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए किया जाता है। इसके कुछ प्रमुख उपयोग और सीमाएं निम्नलिखित हैं:

उपयोग:

  • भौतिकी में सिद्धांतों की जांच: विमीय समीकरण का उपयोग किसी भौतिक सिद्धांत की सटीकता की जांच के लिए किया जा सकता है। अगर समीकरण में विमाएँ संतुलित नहीं हैं, तो सिद्धांत गलत हो सकता है।
  • समीकरणों का निर्माण: जब किसी समस्या के लिए समीकरण बनाना होता है, तो विमीय विश्लेषण से सही समीकरण का निर्माण करने में मदद मिलती है।
  • यूनिट कन्वर्ज़न: विमीय समीकरण का उपयोग विभिन्न मात्राओं के बीच संबंध स्थापित करने और यूनिट परिवर्तनों को समझने में किया जाता है।
  • समीकरणों की सादगी: इसे जटिल समीकरणों को सरल बनाने के लिए भी उपयोग किया जाता है, जिससे समाधान प्रक्रिया आसान हो जाती है।

सीमाएं:

  • सटीकता की कमी: विमीय समीकरण केवल विमाओं के संतुलन पर आधारित होते हैं और यह हमेशा सटीक परिणाम नहीं देते हैं। कुछ मामलों में, यह समीकरण वास्तविकता से भिन्न हो सकते हैं।
  • गणितीय विवरण की कमी: विमीय समीकरण में केवल विमाओं पर ध्यान दिया जाता है, जो गणितीय विवरण और गुणांक को छोड़ देता है। इससे कुछ महत्वपूर्ण जानकारी का अभाव हो सकता है।
  • विशिष्टता की कमी: विमीय समीकरण का उपयोग केवल सामान्य सिद्धांतों और समीकरणों के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह विशेष मामलों या जटिल प्रणालियों में सीमित हो सकता है।
  • समीकरणों की संख्या: कभी-कभी, विमीय समीकरण से कई संभावित समीकरण बन सकते हैं, जिससे सही समीकरण चुनना मुश्किल हो सकता है।

इस तरह, विमीय समीकरण भौतिकी और गणित में एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं, लेकिन इनके उपयोग के साथ कुछ सीमाएं भी होती हैं।


9) निम्न राशियों के विमीय सूत्र लिखिए-

दाब प्रवणता, जड़त्व आघूर्ण, कोणीय संवेग, आवेश, विभवान्तर, धारिता, चालकता।

= निम्नलिखित राशियों के विमीय सूत्र इस प्रकार हैं:

  • दाब प्रवणता (Pressure Gradient) – इसका विमीय सूत्र है [M L^-1 T^-2].
  • जड़त्व आघूर्ण (Moment of Inertia) – इसका विमीय सूत्र है [M L^2].
  • कोणीय संवेग (Angular Momentum) – इसका विमीय सूत्र है [M L^2 T^-1].
  • आवेश (Charge) – इसका विमीय सूत्र है [I T].
  • विभवान्तर (Potential Difference) – इसका विमीय सूत्र है [M L^2 T^-3 I^-1].
  • धारिता (Capacitance) – इसका विमीय सूत्र है [M^-1 L^-2 T^4 I^2].
  • चालकता (Conductance) – इसका विमीय सूत्र है [M^-2 L^-2 T^3 I^2].

इन विमीय सूत्रों का उपयोग विभिन्न भौतिक अवधारणाओं को समझने और विश्लेषण करने में किया जाता है।


10) मात्रकों की S.I. पद्धति को समझाते हुए श्यानता गुणांक, बलाघूर्ण, चुम्बकीय फ्लक्स तथा स्वप्रेरण गुणांक के विमीय सूत्र लिखिए।

= मात्रकों की S.I. पद्धति (अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय मात्रक प्रणाली) में भौतिक राशियों के लिए मानक मात्रक निर्धारित किए गए हैं। यहाँ श्यानता गुणांक, बलाघूर्ण, चुम्बकीय फ्लक्स और स्वप्रेरण गुणांक के विमीय सूत्र दिए गए हैं:

  • श्यानता गुणांक (Coefficient of Viscosity): श्यानता गुणांक एक तरल की प्रवाहकीयता को दर्शाता है। इसका विमीय सूत्र है:
    [M L^-1 T^-1]
  • बलाघूर्ण (Torque): बलाघूर्ण एक बल का वह प्रभाव है जो किसी वस्तु को घुमाने के लिए आवश्यक होता है। इसका विमीय सूत्र है:
    [M L^2 T^-2]
  • चुम्बकीय फ्लक्स (Magnetic Flux): चुम्बकीय फ्लक्स चुम्बकीय क्षेत्र की माप है, जो किसी क्षेत्र में चुम्बकीय क्षेत्र की ताकत को दर्शाता है। इसका विमीय सूत्र है:
    [M L^2 T^-2 I^-1]
  • स्वप्रेरण गुणांक (Self-Inductance): स्वप्रेरण गुणांक एक परिपथ में चुम्बकीय क्षेत्र के कारण उत्पन्न होने वाले प्रेरण धारा का माप है। इसका विमीय सूत्र है:
    [M L^2 T^-2 I^-2]

इन विमीय सूत्रों का उपयोग भौतिकी और अभियांत्रिकी में विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए किया जाता है।


11) भौतिक राशि की विमा को परिभाषित करते हुए प्रत्यास्थता गुणांक तथा गुरुत्वीय सार्वत्रिक नियतांक के विमीय सूत्र व्युत्पन्न कीजिए।

= भौतिक राशि की विमा (Dimensions of Physical Quantities) किसी भौतिक राशि के मूलभूत मात्राओं के संदर्भ में उसकी संरचना को दर्शाती है। यह विमा यह बताती है कि किसी भौतिक राशि को व्यक्त करने के लिए कौन-कौन सी मूलभूत मात्राओं की आवश्यकता है। भौतिक राशियों की विमा को मूलभूत मात्राओं जैसे कि लंबाई (L), समय (T), द्रव्यमान (M) आदि के रूप में दर्शाया जाता है।

प्रत्यास्थता गुणांक (Coefficient of Restitution) एक माप है जो यह बताता है कि दो वस्तुओं के बीच टकराने के बाद उनकी गति में कितना परिवर्तन होता है। इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा परिभाषित किया जा सकता है:

e = (v2 – v1) / (u1 – u2)

जहाँ:

  • e = प्रत्यास्थता गुणांक
  • u1 = पहले वस्तु की प्रारंभिक गति
  • u2 = दूसरे वस्तु की प्रारंभिक गति
  • v1 = पहले वस्तु की अंतिम गति
  • v2 = दूसरे वस्तु की अंतिम गति

गुरुत्वीय सार्वत्रिक नियतांक (Universal Gravitational Constant) का विमीय सूत्र व्युत्पन्न करने के लिए, हम निम्नलिखित सूत्र का उपयोग करते हैं:

F = G * (m1 * m2) / r^2

जहाँ:

  • F = बल
  • G = गुरुत्वीय सार्वत्रिक नियतांक
  • m1 और m2 = द्रव्यमान
  • r = दो द्रव्यमानों के बीच की दूरी

इस सूत्र में, बल का विमा [M * L / T^2] है, द्रव्यमान का विमा [M] है, और दूरी का विमा [L] है।


अब, हम G के लिए विमा निकालते हैं:

F = G * (m1 * m2) / r^2

=> G = F * r^2 / (m1 * m2)

अब, विमा को प्रतिस्थापित करते हैं:

G = [M * L / T^2] * [L^2] / [M * M]

=> G = [M * L^3 / (M^2 * T^2)]

=> G = [L^3 / (M * T^2)]

तो, गुरुत्वीय सार्वत्रिक नियतांक का विमीय सूत्र है:

G = L^3 / (M * T^2)

अतः, भौतिक राशि की विमा, प्रत्यास्थता गुणांक का सूत्र, और गुरुत्वीय सार्वत्रिक नियतांक का विमीय सूत्र निम्नलिखित हैं:

  • भौतिक राशि की विमा: L, M, T
  • प्रत्यास्थता गुणांक: e = (v2 – v1) / (u1 – u2)
  • गुरुत्वीय सार्वत्रिक नियतांक का विमीय सूत्र: G = L^3 / (M * T^2)


12) मूल मात्रक व व्युत्पन्न मात्रकों को परिभाषित कीजिए। S.I. पद्धति में निर्धारित मूल मात्रकों का वर्णन कीजिए।

= मूल मात्रक वे मात्रक होते हैं जो किसी भौतिक मात्रा को मापने के लिए सीधे उपयोग किए जाते हैं और इनका कोई अन्य मात्रक से व्युत्पत्ति नहीं होती। उदाहरण के लिए, लंबाई, द्रव्यमान, समय, तापमान आदि मूल मात्रक हैं।

व्युत्पन्न मात्रक वे होते हैं जो मूल मात्रकों के संयोजन से प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए, गति (लंबाई/समय), बल (द्रव्यमान * लंबाई/समय^2) और ऊर्जा (बल * लंबाई) व्युत्पन्न मात्रक हैं।

S.I. पद्धति में निर्धारित मूल मात्रक निम्नलिखित हैं:

  • लंबाई (Meter – m)
  • द्रव्यमान (Kilogram – kg)
  • समय (Second – s)
  • तापमान (Kelvin – K)
  • विद्युत धारा (Ampere – A)
  • मात्रा (Mole – mol)
  • प्रकाश की तीव्रता (Candela – cd)

इन मूल मात्रकों का उपयोग विभिन्न व्युत्पन्न मात्रकों की गणना करने के लिए किया जाता है, जिससे भौतिक विज्ञान और गणित में विभिन्न समस्याओं को हल किया जा सके।

उत्तर: मूल मात्रक और व्युत्पन्न मात्रक की परिभाषा दी गई है और S.I. पद्धति में मूल मात्रकों का वर्णन किया गया है।


13) मापन की आवश्यकता को समझाते हुए मात्रकों की पद्धतियों का वर्णन कीजिए।

= मापन की आवश्यकता विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, और दैनिक जीवन में कई कारणों से होती है। मापन के बिना, हम वस्तुओं, घटनाओं, और प्रक्रियाओं को सही तरीके से समझ नहीं सकते। मापन हमें जानकारी प्रदान करता है, जिससे हम तुलना, विश्लेषण, और निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। उदाहरण के लिए, मापन के माध्यम से हम यह जान सकते हैं कि कोई वस्तु कितनी भारी है, उसकी लंबाई क्या है, या तापमान कितना है।

मात्रकों की पद्धतियाँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं:

  • सापेक्ष मात्रक (Relative Measurements): इसमें मापन किसी अन्य वस्तु या मान के सापेक्ष किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हम कहते हैं कि एक किताब का वजन 2 किलो है, तो यह केवल तब समझ में आता है जब हम इसे किसी मानक वजन के सापेक्ष देखते हैं।
  • अवश्य मात्रक (Absolute Measurements): इसमें मापन का मान किसी मानक के अनुसार सीधे दिया जाता है। जैसे कि मीटर, किलोग्राम, या सेकंड। ये मात्रक एक निश्चित मानक पर आधारित होते हैं और इन्हें विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त होती है।

मात्रकों की पद्धतियों में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं:

  • SI मात्रक प्रणाली: यह एक अंतरराष्ट्रीय मानक प्रणाली है जिसमें मापन के लिए मीटर (लंबाई), किलोग्राम (वजन), सेकंड (समय), एम्पियर (धारा), केल्विन (तापमान), मोल (पदार्थ की मात्रा), और कैंडेला (प्रकाश की तीव्रता) जैसे मूल मात्रक शामिल हैं।
  • अन्य मात्रक प्रणाली: जैसे कि इम्पीरियल प्रणाली, जिसमें इंच, पाउंड, और फ़ारेनहाइट जैसे मात्रक शामिल होते हैं।
  • मापन उपकरण: विभिन्न मापन के लिए विभिन्न उपकरणों का उपयोग किया जाता है, जैसे कि स्केल (वजन के लिए), मापने का टेप (लंबाई के लिए), थर्मामीटर (तापमान के लिए), आदि।

मापन की प्रक्रिया में सटीकता और विश्वसनीयता बहुत महत्वपूर्ण होती है, ताकि परिणाम सही और उपयोगी हो सकें।


1) बल तथा संवेग को परिभाषित कर उनका मात्रक व विमीय सूत्र लिखिये।

= बल (Force) और संवेग (Momentum) भौतिकी के महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। आइए इनके बारे में विस्तार से जानते हैं।

बल:

बल एक भौतिक परिमाण है जो किसी वस्तु की गति में परिवर्तन करने की क्षमता रखता है। इसे एक वेक्टर के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसका मतलब है कि बल की दिशा और परिमाण दोनों होते हैं।

मात्रक: बल का SI मात्रक न्यूटन (N) है।

विमीय सूत्र: बल का विमीय सूत्र [M^1 L^1 T^-2] है। यहाँ:

  • M = द्रव्यमान (Mass)
  • L = लंबाई (Length)
  • T = समय (Time)

संवेग:

संवेग किसी वस्तु की गति की मात्रा को दर्शाता है और इसे भी एक वेक्टर के रूप में परिभाषित किया जाता है। संवेग का सूत्र है:

संवेग (p) = द्रव्यमान (m) × वेग (v)

मात्रक: संवेग का SI मात्रक किलोग्राम मीटर प्रति सेकंड (kg·m/s) है।

विमीय सूत्र: संवेग का विमीय सूत्र [M^1 L^1 T^-1] है। यहाँ:

  • M = द्रव्यमान (Mass)
  • L = लंबाई (Length)
  • T = समय (Time)

इस प्रकार, बल और संवेग की परिभाषा, मात्रक और विमीय सूत्र ज्ञात हुए।


2) संवेग संरक्षण नियम का कथन लिखिए।

= संवेग संरक्षण नियम के अनुसार, यदि कोई बाहरी बल किसी प्रणाली पर कार्य नहीं करता है, तो उस प्रणाली का कुल संवेग समय के साथ अपरिवर्तित रहता है। इसे इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:

“किसी भी बंद प्रणाली में, संवेग का कुल योग हमेशा स्थिर रहता है, जब तक कि प्रणाली पर कोई बाहरी बल कार्य नहीं करता।”

यह नियम भौतिकी में बहुत महत्वपूर्ण है और इसे विभिन्न प्रकार की समस्याओं को हल करने में उपयोग किया जाता है, जैसे कि टकराव और विस्फोटों के अध्ययन में।

______

3) रेखीय संवेग संरक्षण का सिद्धान्त क्या है? इसका गणितीय व्यंजक प्राप्त कीजिए।

= रेखीय संवेग संरक्षण का सिद्धांत यह कहता है कि यदि किसी प्रणाली पर कोई बाहरी बल कार्य नहीं करता है, तो उस प्रणाली का कुल रेखीय संवेग स्थिर रहता है। इसे समझने के लिए, हम संवेग के परिभाषा और उसके संरक्षण के सिद्धांत पर ध्यान देते हैं।

संवेग (Momentum) को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया जाता है:

p = m · v

जहाँ p संवेग है, m वस्तु का द्रव्यमान है, और v वस्तु की गति है।

यदि हम एक बंद प्रणाली पर विचार करें जिसमें दो वस्तुएं हैं, m1 और m2, जिनकी गति क्रमशः v1 और v2 है, तो प्रणाली का कुल संवेग होगा:

P_total = p1 + p2 = m1 · v1 + m2 · v2

यदि कोई बाहरी बल नहीं है, तो समय के साथ कुल संवेग अपरिवर्तित रहेगा:

P_total = constant

इसका गणितीय व्यंजक इस प्रकार लिखा जा सकता है:

m1 · v_{1i} + m2 · v_{2i} = m1 · v_{1f} + m2 · v_{2f}

जहाँ v_{1i} और v_{2i} प्रारंभिक गति हैं, और v_{1f} और v_{2f} अंतिम गति हैं।


4) कार्य किसे कहते हैं? यह किस प्रकार की राशि है? इसका मात्रक एवं विमा लिखिए।

= कार्य को भौतिकी में उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें एक बल किसी वस्तु पर कार्य करता है और वह वस्तु उस बल की दिशा में स्थानांतरित होती है। कार्य की गणना निम्नलिखित सूत्र से की जाती है:

कार्य (W) = बल (F) × विस्थापन (s) × cos(θ)

यहाँ:

  • W = कार्य
  • F = बल
  • s = विस्थापन
  • θ = बल और विस्थापन के बीच का कोण

कार्य एक स्केलर राशि है, जिसका अर्थ है कि इसमें केवल मात्रा होती है, दिशा नहीं होती।

कार्य का मात्रक अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली (SI) में जूल (Joule) है।

कार्य की विमा (डाइमेंशन) इस प्रकार है:

– [M^1 L^2 T^-2]

यहाँ,

  • M = द्रव्यमान (mass)
  • L = लंबाई (length)
  • T = समय (time)

इस प्रकार, कार्य की परिभाषा, मात्रक और विमा सभी महत्वपूर्ण हैं।


5) जूल को परिभाषित कीजिए।

= जूल (Joule) कार्य, ऊर्जा और गर्मी की एक माप है। इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली (SI) में कार्य का मानक मात्रक माना जाता है।

एक जूल को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है:

जब एक बल 1 न्यूटन (Newton) की शक्ति से किसी वस्तु को उसकी दिशा में 1 मीटर (meter) की दूरी तक खींचता है, तो उस स्थिति में किया गया कार्य 1 जूल होता है।

इसका गणितीय रूप में अभिव्यक्ति इस प्रकार है:

1 जूल = 1 न्यूटन × 1 मीटर

जूल ऊर्जा, कार्य और गर्मी की माप के लिए एक महत्वपूर्ण मात्रक है, और इसे अक्सर भौतिकी और इंजीनियरिंग में उपयोग किया जाता है।


6) धनात्मक एवं ऋणात्मक कार्य से क्या तात्पर्य है?

= धनात्मक कार्य और ऋणात्मक कार्य से तात्पर्य कार्य के दिशा और प्रभाव से है।

धनात्मक कार्य:

जब कोई बल किसी वस्तु के आंदोलन की दिशा में कार्य करता है, तो उसे धनात्मक कार्य कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी वस्तु को ऊपर की ओर उठाते हैं, तो आपके द्वारा किया गया कार्य धनात्मक होगा क्योंकि बल (आपका हाथ) और वस्तु का आंदोलन एक ही दिशा में हैं।

ऋणात्मक कार्य:

जब कोई बल किसी वस्तु के आंदोलन की विपरीत दिशा में कार्य करता है, तो उसे ऋणात्मक कार्य कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी वस्तु को नीचे की ओर खींचते हैं, जबकि वह वस्तु ऊपर की ओर जा रही है, तो इस स्थिति में आपका कार्य ऋणात्मक होगा क्योंकि बल और वस्तु का आंदोलन विपरीत दिशाओं में हैं।

इस प्रकार, धनात्मक कार्य का तात्पर्य ऊर्जा के संचय से है, जबकि ऋणात्मक कार्य का तात्पर्य ऊर्जा के ह्रास से है।


7) घर्षण को कम करने की विधियां क्या हैं तथा समझाइए कि वे कैसे घर्षण को कम करती हैं।

= घर्षण को कम करने के लिए कई विधियाँ अपनाई जा सकती हैं। ये विधियाँ मुख्यतः घर्षण के कारणों को समझकर और उनके प्रभाव को कम करके कार्य करती हैं। यहाँ कुछ प्रमुख विधियाँ दी गई हैं:

  • स्नेहक का उपयोग: स्नेहक जैसे तेल या ग्रीस का उपयोग करके घर्षण को कम किया जा सकता है। स्नेहक सतहों के बीच एक पतली परत बनाते हैं, जिससे दो सतहों के बीच संपर्क कम होता है और घर्षण की मात्रा घटती है।
  • सतहों की चिकनाई: सतहों को चिकना और समतल बनाकर भी घर्षण को कम किया जा सकता है। जब सतहें अधिक चिकनी होती हैं, तो उनके बीच घर्षण कम होता है।
  • सामग्री का चयन: कुछ सामग्री स्वाभाविक रूप से कम घर्षण उत्पन्न करती हैं। जैसे कि प्लास्टिक या विशेष धातुएं जिनका घर्षण गुणांक कम होता है। इन सामग्रियों का उपयोग करके घर्षण को कम किया जा सकता है।
  • आकार और डिजाइन में बदलाव: मशीनों या उपकरणों के डिजाइन में सुधार करके भी घर्षण को कम किया जा सकता है। जैसे कि पहियों का आकार बढ़ाना या उनके बीच की दूरी को बढ़ाना।
  • वायु प्रतिरोध का उपयोग: वायु प्रतिरोध का उपयोग करके भी घर्षण को कम किया जा सकता है। जैसे कि हवाई जहाज के पंखों का डिजाइन, जो वायु के प्रवाह को कम घर्षण में मदद करता है।

ये विधियाँ घर्षण को कम करने में मदद करती हैं क्योंकि वे सतहों के बीच संपर्क को घटाती हैं, जिससे घर्षण की शक्ति कम होती है और मशीनों या उपकरणों की कार्यक्षमता बढ़ती है।

इन विधियों के उपयोग से कार्यक्षमता में सुधार होता है, ऊर्जा की खपत कम होती है और उपकरणों की आयु भी बढ़ती है।

उत्तर: घर्षण को कम करने के लिए स्नेहक का उपयोग, सतहों की चिकनाई, सामग्री का चयन, आकार और डिजाइन में बदलाव, और वायु प्रतिरोध का उपयोग किया जा सकता है।


8) कोई पिण्ड नत तल पर गति करता है तो बल F के द्वारा पिण्ड पर किए गए कार्य को समझाइए।

= जब कोई पिण्ड नत तल पर गति करता है, तो उस पर लगने वाला बल F और उसके द्वारा किए गए कार्य को समझने के लिए हमें कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना होगा।

1. कार्य (Work) की परिभाषा: कार्य को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि यदि कोई बल (F) किसी वस्तु को उसकी गति की दिशा में स्थानांतरित करता है, तो उस बल द्वारा किया गया कार्य (W) बल और स्थानांतरन (displacement) के गुणनफल के बराबर होता है। इसे निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त किया जाता है:

W = F * d * cos(θ)

जहाँ,

  • W = कार्य
  • F = बल
  • d = स्थानांतरण की दूरी
  • θ = बल और स्थानांतरण के बीच का कोण

2. नत तल पर गति: जब पिण्ड नत तल पर गति कर रहा होता है, तो बल F आमतौर पर पिण्ड के गति की दिशा में होता है। इस स्थिति में, θ = 0 डिग्री होता है, क्योंकि बल और स्थानांतरण की दिशा एक ही होती है।

3. कार्य की गणना: जब θ = 0 डिग्री हो, तो cos(0) = 1 होता है। इसलिए कार्य का सूत्र इस प्रकार होगा:

W = F * d * 1

या

W = F * d

इसका अर्थ है कि बल द्वारा किया गया कार्य पिण्ड पर लगने वाले बल के मान और पिण्ड के द्वारा तय की गई दूरी के गुणनफल के बराबर होता है।

इस प्रकार, जब कोई पिण्ड नत तल पर गति करता है, तो बल F द्वारा किए गए कार्य की गणना बल के मान और पिण्ड के स्थानांतरण की दूरी के गुणनफल के रूप में की जाती है।

अंत में, कार्य का मान इस बात पर निर्भर करेगा कि बल की दिशा और पिण्ड की गति की दिशा में कितना संबंध है।


9) ऊर्जा क्या है? कार्य ऊर्जा प्रमेय को समझाइए।

= ऊर्जा किसी भी कार्य को करने की क्षमता होती है। यह एक महत्वपूर्ण भौतिक गुण है जो विभिन्न रूपों में मौजूद होती है, जैसे कि गतिज ऊर्जा (चलने वाली वस्तुओं में), संभाव्य ऊर्जा (एक वस्तु के स्थिति के कारण), तापीय ऊर्जा (गर्मी के रूप में), रासायनिक ऊर्जा (रासायनिक अभिक्रियाओं में) आदि।

कार्य ऊर्जा प्रमेय के अनुसार, किसी वस्तु पर किया गया कार्य उसकी ऊर्जा में परिवर्तन का कारण बनता है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • यदि कोई वस्तु एक निश्चित दूरी पर किसी बल द्वारा खींची जाती है, तो उस वस्तु पर किया गया कार्य उसकी गतिज ऊर्जा या संभाव्य ऊर्जा को बढ़ा सकता है।
  • कार्य (W) और ऊर्जा (E) के बीच संबंध को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:
    W = ΔE
    जहाँ ΔE ऊर्जा में परिवर्तन है।

उदाहरण के लिए, जब आप किसी गेंद को ऊपर फेंकते हैं, तो आप गेंद पर कार्य करते हैं, जिससे उसकी संभाव्य ऊर्जा बढ़ती है। जब गेंद अपने उच्चतम बिंदु पर पहुँचती है, तो उसकी गतिज ऊर्जा न्यूनतम होती है और संभाव्य ऊर्जा अधिकतम होती है। फिर, जब गेंद गिरती है, तो उसकी संभाव्य ऊर्जा घटती है और गतिज ऊर्जा बढ़ती है।

इस प्रकार, कार्य ऊर्जा प्रमेय यह बताता है कि ऊर्जा का संरक्षण होता है, अर्थात् ऊर्जा न तो बनाई जाती है और न ही नष्ट होती है, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है।


10) ऊर्जा किसे कहते हैं? यांत्रिकी में ऊर्जा कितने प्रकार की होती हैं, उदाहरण देकर समझाइए।

= ऊर्जा एक भौतिक परिमाण है जो कार्य करने की क्षमता को दर्शाता है। इसे विभिन्न रूपों में व्यक्त किया जा सकता है, जैसे कि गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा, तापीय ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, आदि।

यांत्रिकी में ऊर्जा के मुख्य दो प्रकार होते हैं:

  • गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy): यह किसी वस्तु की गति के कारण होती है। जब कोई वस्तु चलती है, तो उसमें गतिज ऊर्जा होती है। उदाहरण के लिए, एक चलती हुई गाड़ी या एक फेंकी गई गेंद में गतिज ऊर्जा होती है। गतिज ऊर्जा का सूत्र है:
    गतिज ऊर्जा = (1/2) * मांस (mass) * वेग^2 (velocity^2)।
  • स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy): यह ऊर्जा किसी वस्तु की स्थिति या स्थिति में परिवर्तन के कारण होती है। जब कोई वस्तु ऊँचाई पर होती है, तो उसमें स्थितिज ऊर्जा होती है। उदाहरण के लिए, एक ऊँचाई पर रखी हुई गेंद या एक खींची हुई तीर में स्थितिज ऊर्जा होती है। स्थितिज ऊर्जा का सूत्र है:
    स्थितिज ऊर्जा = मांस * गुरुत्वाकर्षण (gravitational acceleration) * ऊँचाई (height)।

इन दोनों प्रकार की ऊर्जा का उपयोग विभिन्न यांत्रिक कार्यों में किया जाता है और ये एक दूसरे में परिवर्तित भी हो सकती हैं। जैसे, जब एक गेंद को गिराया जाता है, तो उसकी स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

अंत में, ऊर्जा का सही उपयोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है।

उत्तर: ऊर्जा के दो प्रकार: गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा।


11) गतिज ऊर्जा किसे कहते हैं? गतिज ऊर्जा का व्यंजक व्युत्पन्न कीजिए।

= गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) उस ऊर्जा को कहते हैं जो किसी वस्तु के गति में होने के कारण होती है। जब कोई वस्तु चलती है, तो उसमें गतिज ऊर्जा होती है। गतिज ऊर्जा की मात्रा वस्तु के द्रव्यमान (mass) और उसकी गति (velocity) पर निर्भर करती है।

गतिज ऊर्जा का व्यंजक व्युत्पन्न करने के लिए, हम निम्नलिखित सिद्धांतों का उपयोग करते हैं:

  • 1. एक वस्तु के द्रव्यमान को ‘m’ और उसकी गति को ‘v’ मान लेते हैं।
  • 2. जब कोई वस्तु एक निश्चित दूरी ‘s’ को चलती है, तो उसे गति के कारण कार्य (work) करना पड़ता है। कार्य को ‘W’ से दर्शाते हैं।
  • 3. न्यूटन का दूसरा नियम कहता है कि कार्य (W) = बल (Force) × दूरी (Distance)।
  • 4. बल (Force) को हम निम्नलिखित तरीके से व्यक्त कर सकते हैं:
    F = m × a,
    जहाँ ‘a’ वस्तु की त्वरण (acceleration) है।
  • 5. अब, कार्य को बल और दूरी के रूप में लिखा जा सकता है:
    W = F × s = m × a × s।
  • 6. त्वरण (a) को गति (v) और समय (t) के संदर्भ में भी लिखा जा सकता है:
    a = (v – u) / t,
    जहाँ ‘u’ प्रारंभिक गति है। यदि वस्तु प्रारंभ में स्थिर है (u = 0), तो a = v / t हो जाएगा।
  • 7. जब हम ‘s’ को गति और समय के संदर्भ में लिखते हैं, तो:
    s = u × t + 0.5 × a × t²।
    यदि u = 0 है, तो s = 0.5 × a × t²।
  • 8. इन सभी समीकरणों को जोड़ते हुए, हम गतिज ऊर्जा का व्यंजक प्राप्त कर सकते हैं:
    W = m × (v² / (2s)) × s = 0.5 × m × v²।

इस प्रकार, गतिज ऊर्जा का व्यंजक है:
K.E. = 0.5 × m × v²。


12) स्थितिज ऊर्जा किसे कहते हैं। स्थितिज ऊर्जा का व्यंजक प्राप्त कीजिए।

= स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) उस ऊर्जा को कहते हैं जो किसी वस्तु में उसके स्थान या स्थिति के कारण होती है। इसका अर्थ है कि जब कोई वस्तु किसी ऊँचाई पर स्थित होती है या किसी बल के प्रभाव में होती है, तो उसमें ऊर्जा होती है जो उसे अपनी स्थिति से हटाने पर काम में लाई जा सकती है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई वस्तु पृथ्वी की सतह से ऊँचाई पर रखी गई है, तो वह स्थितिज ऊर्जा रखती है। जब वह वस्तु गिरती है, तो यह ऊर्जा गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) में परिवर्तित हो जाती है।

स्थितिज ऊर्जा का व्यंजक (Formula) निम्नलिखित है:

U = mgh

जहाँ:

  • U = स्थितिज ऊर्जा
  • m = वस्तु का द्रव्यमान (mass)
  • g = पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण त्वरित (acceleration due to gravity, लगभग 9.81 m/s²)
  • h = वस्तु की ऊँचाई (height)

इस व्यंजक का उपयोग करके हम किसी वस्तु की स्थितिज ऊर्जा की गणना कर सकते हैं।


13. यांत्रिक ऊर्जा के संरक्षण का नियम क्या है? सिद्ध कीजिए कि स्वतन्त्रता पूर्वक नीचे गिरती हुई वस्तु में यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण होता है।

= यांत्रिक ऊर्जा के संरक्षण का नियम कहता है कि एक बंद प्रणाली में कुल यांत्रिक ऊर्जा (यानी स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा) समय के साथ स्थिर रहती है, जब कोई बाह्य बल प्रणाली पर कार्य नहीं कर रहा हो। इसका मतलब है कि यांत्रिक ऊर्जा का कुल योग हमेशा एक समान रहता है।

अब, हम सिद्ध करते हैं कि स्वतन्त्रता पूर्वक नीचे गिरती हुई वस्तु में यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण होता है।

मान लीजिए कि एक वस्तु को ऊँचाई h से गिराया जा रहा है।

1. प्रारंभिक स्थिति (ऊँचाई h पर):

– वस्तु की स्थितिज ऊर्जा (U) = mgh

– वस्तु की गतिज ऊर्जा (K) = 0 (क्योंकि यह स्थिर है)

कुल यांत्रिक ऊर्जा (E_initial) = U + K = mgh + 0 = mgh

2. गिरते समय (जब वस्तु ऊँचाई h/2 पर है):

– स्थितिज ऊर्जा (U’) = mg(h/2) = mgh/2

– गतिज ऊर्जा (K’) = 1/2 mv² (जहाँ v वस्तु की गति है)

यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण सिद्ध करने के लिए, हमें यह दिखाना होगा कि E_initial = E_final है।

गति के कारण, वस्तु की गतिज ऊर्जा इस प्रकार होगी:

v² = 2gh (गुरुत्वाकर्षण त्वरित के कारण)

इसलिए,

K’ = 1/2 m(2gh) = mgh

अब, कुल यांत्रिक ऊर्जा (E_final) को देखते हैं:

E_final = U’ + K’ = mgh/2 + mgh = (mgh/2 + 2mgh/2) = (3mgh/2)

3. जब वस्तु पृथ्वी की सतह पर पहुँचती है (h = 0):

– स्थितिज ऊर्जा (U_final) = 0

– गतिज ऊर्जा (K_final) = 1/2 mv² (जहाँ v वस्तु की अंतिम गति है)

यहाँ, v² = 2gh, इसलिए K_final = mgh

कुल यांत्रिक ऊर्जा (E_final) = U_final + K_final = 0 + mgh = mgh


14) कार्य, शक्ति तथा ऊर्जा को परिभाषित कीजिए। उनके SI मात्रक क्या है? उनकी विमा लिखिए।

= कार्य, शक्ति और ऊर्जा भौतिकी के महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। आइए इन्हें विस्तार से समझते हैं:

1. कार्य (Work):

कार्य तब होता है जब कोई बल किसी वस्तु को उसकी स्थिति में परिवर्तन करने के लिए लगाया जाता है। कार्य की परिभाषा है:

कार्य = बल × विस्थापन × cos(θ)

जहां θ वह कोण है जो बल और विस्थापन के बीच बनता है।

SI मात्रक: जूल (Joule)

विमा: [W] = [F] × [d] = [M][L][T^-2] × [L] = [M][L^2][T^-2]

2. शक्ति (Power):

शक्ति कार्य की दर को दर्शाती है। यह बताती है कि किसी कार्य को करने में कितना समय लगता है। शक्ति की परिभाषा है:

शक्ति = कार्य / समय

SI मात्रक: वॉट (Watt)

विमा: [P] = [W]/[T] = [M][L^2][T^-2]/[T] = [M][L^2][T^-3]

3. ऊर्जा (Energy):

ऊर्जा किसी कार्य को करने की क्षमता है। ऊर्जा के कई रूप होते हैं, जैसे गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा, तापीय ऊर्जा आदि। ऊर्जा की परिभाषा कार्य के समान है, क्योंकि कार्य और ऊर्जा एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं।

SI मात्रक: जूल (Joule)

विमा: [E] = [W] = [M][L^2][T^-2]

सारांश में:

– कार्य = जूल (J), विमा = [M][L^2][T^-2]

– शक्ति = वॉट (W), विमा = [M][L^2][T^-3]

– ऊर्जा = जूल (J), विमा = [M][L^2][T^-2]

यदि आपको और जानकारी चाहिए, तो पूछ सकते हैं!


1) वृत्तीय गति किसे कहते हैं? एक समान वृत्तीय गति को परिभाषित कीजिए।

= वृत्तीय गति उस गति को कहते हैं जिसमें कोई वस्तु एक निश्चित वृत्त के पथ पर चलती है। जब कोई वस्तु किसी वृत्त के चारों ओर घूमती है, तो उसे वृत्तीय गति कहा जाता है। इस गति में, वस्तु की दिशा लगातार बदलती रहती है, जबकि उसकी गति की माप (स्पीड) समान रह सकती है।

एक समान वृत्तीय गति (Uniform Circular Motion) वह स्थिति है जब कोई वस्तु एक वृत्त के पथ पर समान गति से चलती है। इसका मतलब है कि वस्तु की गति की माप (स्पीड) समय के साथ बदलती नहीं है, लेकिन उसकी दिशा लगातार बदलती रहती है।

इस प्रकार की गति में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं:

  • वस्तु की गति की माप समान रहती है।
  • वस्तु की दिशा लगातार बदलती है, जिससे उसे एक केन्द्र की ओर खींचने वाली बल (centripetal force) की आवश्यकता होती है।
  • वस्तु की स्थिति समय के साथ वृत्त के चारों ओर बदलती रहती है।

उदाहरण के लिए, एक कार यदि एक गोल चक्कर में समान गति से चल रही है, तो वह एक समान वृत्तीय गति में है।

इस प्रकार, वृत्तीय गति और एक समान वृत्तीय गति की विशेषताएँ स्पष्ट हैं।


2) कोणीय विस्थापन, कोणीय वेग व कोणीय त्वरण को परिभाषित कीजिए एवं इनके मात्रक लिखिए।

= कोणीय विस्थापन (Angular Displacement) को परिभाषित करने पर, यह एक कोणीय माप है जो यह दर्शाता है कि कोई वस्तु अपने प्रारंभिक स्थिति से कितने कोण में घूमी है। इसे रैखिक विस्थापन के समानांतर समझा जा सकता है, लेकिन यह कोणीय रूप में होता है। इसका मात्रक रैडियन (radian) होता है।

कोणीय वेग (Angular Velocity) वह दर है जिस पर कोई वस्तु कोणीय विस्थापन करती है। इसे समय के अनुसार कोणीय विस्थापन के परिवर्तन के रूप में समझा जा सकता है। इसका मात्रक रैडियन प्रति सेकंड (rad/s) होता है।

कोणीय त्वरण (Angular Acceleration) वह दर है जिस पर कोणीय वेग में परिवर्तन होता है। यह यह बताता है कि कोई वस्तु कितनी तेजी से अपने कोणीय वेग को बदल रही है। इसका मात्रक रैडियन प्रति सेकंड का वर्ग (rad/s²) होता है।

संक्षेप में:

  • कोणीय विस्थापन: रैडियन
  • कोणीय वेग: रैडियन प्रति सेकंड
  • कोणीय त्वरण: रैडियन प्रति सेकंड का वर्ग

आशा है कि यह जानकारी आपके लिए सहायक होगी।


3) कोणीय वेग रेखीय वेग में सम्बन्ध ज्ञात कीजिए।

= कोणीय वेग और रेखीय वेग में संबंध समझने के लिए, पहले इन दोनों वेगों की परिभाषा को जानना जरूरी है।

रेखीय वेग (Linear Velocity) एक वस्तु की गति को दर्शाता है, जो कि किसी निश्चित दिशा में दूरी को समय के साथ मापता है। इसे सामान्यतः ‘v’ से दर्शाया जाता है और इसकी इकाई मीटर प्रति सेकंड (m/s) होती है।

कोणीय वेग (Angular Velocity) एक वस्तु की घूर्णन गति को दर्शाता है, जो कि किसी अक्ष के चारों ओर कोण में परिवर्तन को समय के साथ मापता है। इसे सामान्यतः ‘ω’ से दर्शाया जाता है और इसकी इकाई रेडियन प्रति सेकंड (rad/s) होती है।

दोनों के बीच संबंध इस प्रकार है:

रेखीय वेग (v) को कोणीय वेग (ω) और वस्तु के घूर्णन के लिए अक्ष के चारों ओर की दूरी (r) के साथ जोड़ा जा सकता है। इसका सूत्र है:

v = r * ω

यहां:

  • v = रेखीय वेग
  • r = वस्तु के घूर्णन के लिए अक्ष से दूरी (रेडियस)
  • ω = कोणीय वेग

इसका मतलब है कि यदि हम किसी वस्तु के कोणीय वेग और उसके अक्ष से दूरी को जानते हैं, तो हम रेखीय वेग की गणना कर सकते हैं। इसी प्रकार, यदि हमें रेखीय वेग और दूरी पता है, तो हम कोणीय वेग निकाल सकते हैं:

ω = v / r

इस प्रकार, रेखीय वेग और कोणीय वेग का संबंध एक दूसरे से निकाला जा सकता है।


4) अभिकेन्द्रीय बल क्या होते हैं? उदाहरण देकर समझाइये।

= अभिकेन्द्रीय बल (Centripetal Force) वह बल होता है जो किसी वस्तु को एक वृत्ताकार पथ पर घूमने के लिए आवश्यक होता है। यह बल हमेशा वस्तु के केंद्र की ओर होता है और इसका कार्य वस्तु की गति को वृत्ताकार पथ में बनाए रखना होता है।

उदाहरण के लिए, यदि आप एक गेंद को एक रस्सी के साथ घुमा रहे हैं, तो रस्सी पर लगने वाला बल अभिकेन्द्रीय बल है। जब आप गेंद को घुमाते हैं, तो रस्सी गेंद को उसके केंद्र की ओर खींचती है, जिससे गेंद एक वृत्ताकार पथ में घूमती है।

एक अन्य उदाहरण है पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना। यहाँ सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी के लिए अभिकेन्द्रीय बल का कार्य करता है, जो पृथ्वी को सूर्य के चारों ओर एक निश्चित पथ पर बनाए रखता है।

इस प्रकार, अभिकेन्द्रीय बल वस्तुओं को वृत्ताकार गति में बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है और यह हमेशा उस पथ के केंद्र की ओर कार्य करता है।